इस post में आप RBSE कक्षा 10 भूगोल वन एंव वन्य जीव संसाधन के नोट्स पढ़ पायेंगे| इन नोट्स में सभी महत्वपूर्ण बिदुओं जैसे जैव विविधता, उसका महत्व, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, प्रोजेक्ट टाइगर , राष्ट्रीय उद्यान और अन्य सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं को विस्तार से समझ पायेंगे | आप इन नोट्स को पढ़कर MCQ और अन्य प्रश्नों के उत्तर आसानी से दे सकेंगे|
ये नोट्स हमारे अनुभवी अध्यापकों ने तैयार किये हैं| ये नोट्स पढ़कर आप RBSE कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक ला सकते सकते हैं|

RBSE Class 10 Geography Chapter 2 Notes in Hindi
जैव विविधता (Biodiversity)
पृथ्वी हमारा ग्रह है जिस पर अनेक जीव जंतु, पेड़ पौधे और सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं| इस ग्रह पर सूक्ष्मतम से लेकर हाथी और व्हेल जैसे विशालकाय जीव रहतें हैं | हम मनुष्य भी इन्ही जीवों में से एक हैं और हमारा भी जीवन प्रकृति पर निर्भर करता है|
वायु ,जल मिट्टी, पेड पौधे और जीव जंतु मिलकर एक संतुलित पारिस्थिकी तंत्र का निर्माण करते हैं इन पारिस्थिकी तंत्र में पेड़ पौधों और जीव जंतुओं की अनेक प्राजातियाँ पाई जाती हैं , इस विविधता को ही जैव विविधता कहते हैं |
जैव विविधता केवल जीवों की संख्या नहीं है बल्कि उनके आकार, संरचना, रहने के स्थान और उनके बीच पाए जाने वाले पारस्परिक सम्बन्धों का भी समावेश होता है|प्रत्येक जीव किसी न किसी रूप में दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं|
भारत जैव विविधता की दृष्टि से विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है| यहाँ विश्व की लगभग 8 प्रतिशत जैव वीविधता पाई जाती है| यहाँ वन , पर्वत, मैदान , मरुस्थल और समुद्री क्षेत्र है जहाँ विभिन्न प्रकार के जीव जंतु और वनस्पति पाई जाती है|
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीव जंतुओं, पौधे और सूक्ष्म जीवों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं , इसे जैव विविधता कहते हैं|
सभी जीव एक दूसरे पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर रहते हैं|
जैव विविधता पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण होती है|
भारत में विश्व की लगभग 8 % ज्ञात जैव प्रजातियाँ पी जाती हैं |
जैव विविधता का महत्व
भोजन, वस्त्र, औषधियाँ , लकड़ी और ईंधन आदि मूलभूत आवश्यक चीजें जैव विविधता से ही प्राप्त होती हैं|
पेड़ पौधे वायुमंडल की कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं , इससे पर्यावरण और जलवायु संतुलन बना रहता है|
जैव विविधता के कारण आनुवांशिक विविधता बनी रहती है जिससे फसलों और पशुओं की नई और बेहतर किस्में पैदा होती हैं |
जैव विविधता प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल , वायु , मिट्टी की गुणवता बनाये रखने में सहायक होती है|
भारत में वनस्पति और प्राणी
भारत प्राकृतिक विविधताओं वाला देश है , जहाँ हिमालय, मैदान, पत्थर, मरुस्थल, घने वन अरु समुद्री तट जैसे प्राकृतिक क्षेत्र पाए जाते हैं|
विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु , वर्षा, प्राकृतिक परिस्थितियाँ अलग होने से भारत में अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव जंतु पायें जाते हैं|
भारत में विश्व की लगभग 8 % जैव प्रजातियाँ पाई जाती हैं|
भारत में अनेक प्रकार के वृक्ष,झाड़ियाँ,औषधीय पौधे, लता , घास आदि वनस्पतियाँ पाई जाती हैं|
यहाँ विभिन्न प्रकार के पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभाचार , कीट और सूक्ष्म जीव पाये जाते हैं|
प्रत्येक जीव अपने प्राकृतिक आवास में रहकर पर्यावरण एंव पारिस्थिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं|
पिछले कुछ दशकों में बढती जनसंख्या, वनों की कटाई , औधोगिकीकरण , कृषि विस्तार , शिकार और प्राकृतिक संसधानों के अत्यधिक दोहन के कारण अनेक वनस्पतियाँ और जीव जंतु संकटग्रस्त हो गए हैं|
कई प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं और कुछ विलुप्त होने के कगार पर हैं|
संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए सरकार ने राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभ्यारण्य तथा अन्य योजनाएँ चलाई जा रही हैं|
वन एंव वन्य जीव संरक्षण की आवश्यकता
वन और वन्य जीव पृथ्वी के पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
वर्तमान समय में वनों और वन्य जीवों का तेजी से विनाश हो रहा है इसलिए उनका संरक्षण जरूरी है|
वनों के संरक्षण से जैव विविधता सुरक्षित रहती है तथा विभिन्न जीवों और पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त होने से बचाती है|
वन, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा भूमि की उर्वरता बनाये रखने में सहायता करते हैं|
वन, वर्षा चक्र एंव जलवायु संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं |
वन विभिन्न पौधों और पशुओं की आनुवांशिक विविधता को सुरक्षित रखते हैं, जिससे भविष्य में नई एंव बेहतर वनस्पति और पशु नस्लों का विकास संभव होता हैं|
भारत की कृषि आज भी अनके पारंपरिक फसलों पर आधारित हैं इसलिए कृषि में सुधार के लिए जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है|
वन , वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास है इसलिये वनों को बचान जरुरी है|
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
वन एंव वन्य जीव पर्यावरण संतुलन के आधार हैं|
वन जल , वायु और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हैं|
वन आनुवंशिक विविधता को सुरक्षित रखते हैं|
कृषि एंव मत्स्य पालन जैव विविधता पर निर्भर हैं|
वन लाखों जीवों का प्राकृतिक आवास हैं|
वन एंव वन्य जीवों का संरक्षण वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है|
भारत में वन्य जीव संरक्षण के लिए किये गए प्रयास
प्राचीन कल से ही भारत में वनों और वन्य जीवों को प्रकृति की अमूल्य धरोहर माना जाता है| बढ़ती जनसंख्या , कृषि विस्तार और औद्योगिकिकरण , वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण वनों और वन्य जीवों की संख्या तेजी से घटने लगी है| इन कारणों से भारत सरकार ने वन और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं–
1960 और 1970 के दशक में पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने वन्य जीव संरक्षण के लिए एक प्रभावी राष्ट्रीय नीति बनने की माँग की|
वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए विशेष संरक्षण कार्यक्रम शुरू किये गए|
वन्य जीवों और उनके अंगों के अवैध व्यापार पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान किये गए|
संकटग्रस्त प्राजातियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभ्यारण्य स्थापित किये गए|
सरकार ने बाघ, एक सींग वाले गैंडे , काश्मीरी हंगुल एशियाई शेर, मगरमच्छ आदि संकटग्रस्त जीवों के संरक्षण के लिए विशेष परियोजनाएँ प्रारम्भ की|
वर्तमान भारत में अनेक राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभ्यारण्य और जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किये जा चुके हैं|
इन सभी संरक्षण उपायों का उद्देश्य केवल वन्य जीवों की रक्षा करना नही है बल्कि उनके प्राकृतिक आवासों और सम्पूर्ण पारिस्थिकी तंत्र का संरक्षण करना भी है|
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972
भारत में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानून वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 है| यह अधिनियम वर्ष 1972 में लागू किया गया ताकी वन्य जीवों , पक्षियों और उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण किया जा सके|
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों की घटती संख्या को रोकना और संकटग्रस्त प्राजातियों को विलुप्त होने से बचना था|
अधिनियम लागू होने के बाद पूरे देश में वन्य जीवों के शिकार पर कानूनी नियंत्रण लगाया गया|
इस कानून के अंतर्गत संरक्षित प्रजातियों की सूची तैयार की गई जिन्हें विशेष कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई|
वन्य जीवों का अवैध शिकार उनके अंगों जैसे खाल, दाँत , सींग आदि का व्यापार तथा उनके प्राकृतिक आवासों को नष्ट करना दंडनीय अपराध घोषित किया गया|
इस अधिनियम ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभ्यारण की स्थापना को कानूनी को आधार प्रदान किया गया|
इस कानून के अंतर्गत बाघ,एक सींग वाला गैंडा, एशियाई शेर और मगरमच्छ एंव अन्य संकटग्रस्त जीवों को संरक्षण के लिए विशेष परियोजनाएँ शुरू की गई |
यह अधिनियम भारत में वन्य जीव संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार माना जाता है|
प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)
बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और वन पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण जीव माना जता है|
बीसवीं शताब्दी के मध्य तक भारत में बाघों की संख्या तेजी से घटने लगी| इसके मुख्य कारण थे:
- शिकार
- वनों का विनाश
- प्राकृतिक आवास का सिकुड़ना
- बाघ की खाल और हड्डियों का अवैध व्यापार
एक समय भारत में बाघों की संख्या 55,000 थी जो घटकर केवल 1827 रह गई|
बाघों की लगातार घटती संख्या को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया|
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नही बल्कि उनके प्राकृतिक आवास , भोजन श्रृंखला और सम्पूर्ण वन पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करना भी था|
इस योजना में देश के विभिन्न भागों में टाइगर रिजर्व स्थापित किये गए जहाँ बाघों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करवाया गया|
प्रोजेक्ट टाइगर को विश्व की सबसे सफल वन्य जीव संरक्षण योजनाओं में से एक माना जाता है|
इस परियोजना से भारत में बाघों की संख्या में धीरे धीरे वृद्धि हुई और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा भी मजबूत हुई है|
राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)
राष्ट्रीय उद्यान ऐसे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जहाँ वन्य जीवों , वनस्पतियों और सम्पूर्ण प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण किया जाता है|
इन क्षेत्रों का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना तथा संकटग्रस्त वन्य जीवों को प्राकृतिक आवास उपलब्ध करना है|
राष्ट्रीय उद्यानों में वन्य जीवों का शिकार पूर्णत: प्रतिबंधित होता है|
इन क्षेत्रों में पेडों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी प्रतिबंधित होता है|
राष्ट्रीय उद्यानों में वन्य जीवों और वनस्पतियों को प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रूप से विकिसत होने का अवसर मिलता है|
भारत में कई प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किये गए हैंजिनमे कुछ प्रमुख है:
- कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान
- सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान
- कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
- काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
ये राष्ट्रीय उद्यान बाघ , हाथी ,गैंडा , हिरन और अन्य वन्य जीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
राष्ट्रीय उद्यान पर्यावरण संरक्षण , वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण शिक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं|
राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में भी योगदान देते हैं|
वन्य जीव अभ्यारण (Wildlife Sanctuary)
वन्य जीव अभ्यारण ऐसे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जहाँ वन्य जीवों को सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जता है| इन क्षेत्रों में मुख्य उद्देश वन्य जीवों की रक्षा करना होता है| राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में अभ्यारणों में कुछ सीमित मानव गतिविधियों की अनुमति होती है लेकिन वन्य जीवों को हानि पहुंचाना पूर्णत प्रतिबंधित होता है|
भारत में अनेक वन्य जीव अभ्यारण है जैसे राजस्थान में सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण प्रसिद्ध है| इसके अलावा विभिन्न राज्यों में भी अनेक अभ्यारण स्थापित किये गए हैं|
वन्य जीव अभ्यारण जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| ये क्षेत्र वन्य जीवों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के साथ साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं|
जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve)
जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसे विशाल संरक्षित क्षेत्र होते है जहाँ केवल वन्य जीवों का ही नही बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण किया जता है|
इन क्षेत्रों में वनस्पतियों, वन्य जीवों , सूक्ष्मजीवों और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एक साथ किया जता है|
जैव मंडल आरक्षित क्षेत्रों का मुख्य उद्देश जैव विविधता को सुरक्षित रखना है|
इन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित एवं सतत उपयोग सुनिश्चित किया जाता है, जिससे पर्यावरण और मानव आवश्यकताओं का संतुलन बना रहे|
जैव मंडल आरक्षित क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाता है जिससे जैव विविधता एंव पर्यावरण के बारे में नई जानकारी प्राप्त हो सके|
इन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन किया जाता है|इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है|
भारत में वनों का वर्गीकरण
भारत में वनों के संरक्षण और उचित प्रबन्धन करने के लयी सरकार ने वनों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया है| यह वर्गीकरण इस आधार पर किया गया है कि वन किसके नियंत्रण में हैं तथा उनका उपयोग किस प्रकार किया जाता है|वनों का सही वर्गीकरण करने से उनके संरक्षण , विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग में सुविधा होती है|
भारत में वनों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया गया है –
- आरक्षित वन
- संरक्षित वन
- अवर्गीकृत वन
प्रत्येक प्रकार के वन का अपना अलग उद्देश्य ,महत्व और उपयोग होता है|
वनों का वर्गीकरण केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं होता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है|
जिन वनों में जैव विविधता अधिक होती है तथा जहाँ वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास की रक्षा आवश्यक होती है वहाँ मानवीय गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण रखा जाता है|
कुछ वनों का उपयोग स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं जैसे ईंधन ,चारा,लकड़ी आदि की पूर्ति के लिए भी किया जाता है|
वनों का वर्गीकरण वन संसाधनों के सरंक्षण और उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है|
आरक्षित वन
ये वे वन होते हैं जिनका संरक्षण सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है|
इन वनों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण होता है तथा उनके उपयोग के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं|बिना सरकारी अनुमति के इन वनों में निम्न कार्य नहीं किये जा सकते हैं–
- पेड़ों की कटाई
- वन्य जीवों का शिकार
- पशुओं की चराई
- अन्य मानव गतिविधियाँ
आरक्षित वनों का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक वनस्पतियों , वन्य जीवों और जैव विविधता का संरक्षण करना है|
भारत के कुल वन क्षेत्र का सबसे बड़ा भाग आरक्षित वनों के अंतर्गत आता है|
इन वनों में अनेक दुर्लभ पौधों और वन्य जीवों की प्रजातियाँ सुरक्षित रहती हैं|
ये वन जैव विविधता और संकटग्रस्त जीवों के प्राकृतिक आवास की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
संरक्षित वन
ये वे वन होते हैं जिनकी सुरक्षा सरकार द्वारा की जाती है ताकि उनका अत्यधिक दोहन न हो और वे भविष्य में भी सुरक्षित रह सकें|
इन वनों में सीमित मानवीय गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है लेकिन उनका उपयोग सरकारी नियमों के अनुसार ही किया जाता है|
संरक्षित वनों का मुख्य उद्देश्य वन संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनका संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना होता है|
इन वनों में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया जाता है|
इन वनों में लकड़ी,चारा और अन्य वन उत्पादों का सिमीत मात्रा में उपयोग किया जा सकता है|
वन उत्पादों का उपयोग करते समय वन संरक्षण के नियमों का पालन अनिवार्य होता है|
अवर्गीकृत वन
अवर्गीकृत वन वे होते हैं जो न तो आरक्षित होते हैं और न ही संरक्षित होते हैं| इन वनों का स्वामित्व सरकार, निजी व्यक्तियों और स्थानीय समुदायों के पास होता है| इन क्षेत्रों में वन प्रबंधन की व्यवस्था अन्य वनों की तुलना में अलग होती है|
ये वन देश के कुछ विशेष क्षेत्रों में पाए जाते हैं|
स्थानीय समुदाय इन वनों का उपयोग अपनी दैनिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए करते हैं|
इन वनों से स्थानीय लोग ईंधन , चारा, लकड़ी और अन्य वन उत्पाद प्राप्त करते हैं , लेकिन यदि इन वनों का उचित प्रबन्धन नहीं किया जाए तो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन की संभावना रहती है|
भारत में वनों का वितरण
भारत के सभी राज्यों में वनों का वितरण सामान नहीं है| कहीं वन क्षेत्र अधिक हैं तो कही बहुत ही कम |
वनों के असमान वितरण के प्रमुख कारण निम्न हैं:
- भौगोलिक स्थिति
- जलवायु
- वर्षा की मात्रा
- भूमि की प्रकृति
जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां सामान्य रूप से वन क्षेत्र भी अधिक पाया जाता है|
शुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा कम होने के कारण वन क्षेत्र अपेक्षाकृत कम होते हैं|
मध्य प्रदेश में स्थायी वनों का क्षेत्र सबसे अधिक है|
जम्मू कश्मीर , आंध्र प्रदेश , उत्तराखंड , केरल , तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल और महारष्ट्र में आरक्षित वनों का बड़ा भाग पाया जाता है|
बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश , ओडिशा और राजस्थान में संरक्षित वनों का अनुपात अधिक है|
उत्तर पूर्वी राज्यों और गुजरात में अवर्गीकृत वन अधिक पाए जाते हैं|
समुदाय और वन संरक्षण
वनों की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि स्थानीय समुदायों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है|
भारत के अनेक क्षेत्रों में लोग सदियों से जंगलों को अपनी प्राकृतिक धरोहर मानते आए हैं और उनकी रक्षा भी करते रहें हैं|
स्थानीय लोगों का जीवन , आजीविका और दैनिक आवश्यकताएँ वनों से जुड़ी होती है इसलिए वे वन संरक्षण के महत्व को समझते हैं|
राजस्थान के सरिस्का बाघ रिजर्व में स्थानीय लोगों ने खनन कार्य का विरोध किया क्यों कि इससे वनों और वन्य जीवों को नुकसान पहुँच रहा है |
राजस्थान के अलवर जिले के पाँच गाँवों के लोगों ने लगभग 1200 हेक्टेयर वन क्षेत्र को संरक्षित घोषित कर दिया|
वन संरक्षण तभी सफल हो सकता है जब सकरार और स्थानीय लोग मिलकर कार्य करें|
पवित्र उपवन
पवित्र उपवन ऐसे वन क्षेत्र होते हैं जिन्हें धार्मिक एंव सांस्कृतिक आस्था के कारण संरक्षित रखा जाता है|
भारत की अनेक जन जातियाँ और ग्रामीण समुदाय प्रकृति को पूजनीय मानते हैं इसलिये उन्होंने पवित्र उपवनों की परंपरा को विकसित किया|
लोग विश्वास करते हैं कि वनों में देवी देवता रहते हैं|
धार्मिक मान्यताओं के कारण इन उपवनों में पेड़ों की कटाई , वन्य जीवों का शिकार और किसी प्रकार की हानि पहुंचाना प्रतिबंधित माना जाता है|
पवित्र वनों आज भी दुर्लभ वनस्पतियाँ और वन्य जीव सुरक्षित हैं|
झारखंड के मुंडा और संथाल समुदाय महुआ और कदम्ब के वृक्षों की पूजा करते हैं|
ओडिशा और बिहार की कुछ जन्तातियाँ विव्ह के अवसर पर इमली और आम के वृक्षों की पूजा करती हैं|
पवित्र उपवन यह सिद्ध करते है कि प्रकृति के सम्मान और आस्था पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी तरीका हो सकते हैं|
चिपको आंदोलन
चिपको आंदोलन भारत के सबसे महत्वपूर्ण पर्यवरण आंदोलनों में से एक है|
इस आंदोलन की शुरुआत हिमालयी क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकने के लिए की गई थी|
जब पेडों को काटने के लिए मजदूर जंगल में जाते थे तो ग्रामीण लोग पेड़ों से चिपक जाते थे और पेड़ों को बचाते थे इसलिए इसका नाम चिपको आंदोलन पड़ा|
इस आंदोलन ने वनों के महत्व को इस प्रकार समझाया :-
- मिट्टी का संरक्षण
- जल स्त्रोतों की सुरक्षा
- जलवायु संतुलन बनाए रखना
- जैव विविधता का संरक्षण
इस आंदोलन ने सथानीय प्रजातियों के वृक्ष लगाने को बढ़ावा दिया|
इस आंदोलन की सफलता ने पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण की नई सोच विकसित की|
संयुक्त वन प्रबंधन
संयुक्त वन प्रबंधन एक ऎसी योजना है जिसका उद्देश्य वन संरक्षण में स्थानियी लोगों की भागीदारी बढ़ाना है|
इस कार्यक्रम में सरकार और स्थानीय समुदाय मिलकर वनों के संरक्षण एंव विकास कार्य करते हैं|
इस कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1988 में हुई थी|
ओडिशा संयुक्त वन प्रबंधन योजना का प्रस्ताव स्वीकार करने वाला पहला राज्य था|
इस योजना के अंतर्गत गाँव स्तर पर संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ बनाई जाती हैं|
इन समितियों में ग्रामीणों और वन विभाग के अधिकारियों की संयुक्त भागीदारी होती है|
संयुक्त वन प्रबंधन समितियाँ निम्न कार्य करती हैं:-
- वनों की सुरक्षा करना
- नए पौधे लगाना
- अवैध कटाई को रोकना
- वन संसाधनों का उचित एंव संतुलित उपयोग करना
संयुक्त वन प्रबंधन ने यह सिद्ध किया है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से वन अधिक सुरक्षित रहते हैं|
पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका
वन और वन्य जीवों का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से पूरी तरह से सफल नहीं हो सकता है| इसके लिए स्थानीय लोगों को इस कार्य में शामिल किया जाता है|
भारत में अनेक क्षेत्रों में लोग अपनी परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं के माध्यम से प्रकृति और वन्य जीवों की रक्षा करते हैं|
राजस्थान का बिश्नोई समुदाय वन और वन्य जीव संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है|इस समुदाय के लोग इसे अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं|
सभी के सयुंक्त प्रयासों से ही जैव विविधता सुरक्षित रह सकती है और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और संतुलित पर्यावरण प्राप्त हो सकेगा|