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2026/05/24

RBSE Class 10 Geography Chapter 1 Notes in Hindi |RBSE कक्षा 10 संसाधन और विकास नोट्स

इस post में आप RBSE कक्षा 10 भूगोल अध्याय 1 संसाधन और विकास के नोट्स पढ़ पायेंगे| इन नोट्स में सभी महत्वपूर्ण बिदुओं  जैसे संसाधन क्या है?, संसाधन का वर्गीकरण, दुरूपयोग , सतत विकास, संसाधनों का सरंक्षण , भूमि और मृदा के प्रकार , मृदा अपरदन आदि का वर्णन किया गया| आप इन नोट्स को पढ़कर MCQ  और अन्य प्रश्नों के उत्तर आसानी से दे सकेंगे|

RBSE Class 10 Geography Chapter 1 Notes in Hindi


संसाधन एवं विकास नोट्स


परिचय

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वो सब कुछ हो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में काम सकता है , संसाधन कहलाता है, लेकिन ये तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से उपलब्ध और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होने चाहिए | इसका अर्थ यह है कि प्रकृति में उपस्थित वस्तुएँ अपने आप संसाधन नही होती हैं  बल्कि जब मनुष्य तकनीक की सहायता से उनका उपयोग करना सीखता है तब वे संसाधन बनती हैं|


इसलिए संसाधन प्रकृति का मुफ्त उपहार नहीं है | मनुष्य प्रकृति के साथ तकनीक के माध्यम से सम्पर्क करता है और आर्थिक विकास को गति देने के लिए संस्थायें बनाता है| गाँवों और शहरों में जीवन को आरामदायक बनाने वाली वस्तुएँ प्राकृतिक पदार्थों से बनती हैं जिन्हें मनुष्य अपने श्रम और ज्ञान से उपयोगी बनाता है| इस प्रक्रार प्रकृति , तकनीक और संस्थाओं के पारस्परिक सम्बन्ध से संसाधनों का निर्माण होता है|


मुख्य बिंदु


           i. संसाधन = प्रकृति + तकनीक + संस्थायें

          ii. मनुष्य संसाधनों का निर्माता और उपयोगकर्ता है

 

संसाधनों का वर्गीकरण


संसाधनों को उनके उद्गम , समाप्त होने की अवधि, स्वामित्व और विकास की स्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है| उद्गम के आधार पर संसाधन –(i) जैविक (ii) अजैविक होते हैं| समाप्त होने की अवधि के आधार पर (i) नवीकरणीय (ii) अनवीकरणीय होते हैं| स्वामित्व के आधार पर व्यक्तिगत , सामुदायिक, राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय संसाधन होते हैं| विकास की स्थिति के आधार पर संसाधन संभावित,विकसित,भंडार और संचित श्रेणी के होते हैं|

संसाधनों के वर्गीकरण  सही उपयोग और योजना बनाने में सहायक होता है |


मुख्य बिंदु


 i. वर्गीकरण के चार आधार- उद्गम, समाप्ति, स्वामित्व और विकास

 iiवर्गीकरण सही योजना बनाने और उपयोग में सहायक


संसाधनों का विकास


(i)संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से समस्याएँ


जब संसाधनों को प्रकृति का मुफ्त उपहार माना गया , तब उसका अत्यधिक और लापरवाही से उपयोग किया गया| इससे संसाधनों की कमी होने लगी और कुछ लोगों के हाथों में संसाधनों का संचय हो गया, जिससे समाज  अमीर और गरीब  वर्ग में बंट गया | इसके साथ ही संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे वैश्विक तापमान में वृद्धि , प्रदूषण , ओजोन परत का क्षय और भूमि क्षरण आदि उत्पन्न हो गए|


यह स्थिति बताती  है कि संसाधनों का गलत और अविवेक पूर्ण तरीके से किया गया  उपयोग  प्रकृति और समाज दोनों के लिए हानिकारक होता है|


मुख्य बिंदु


        i. संसाधनों की कमी और असमानता

       ii. पर्यावरण संकट


(ii) सतत विकास


सतत विकास का अर्थ होता है कि ऐसा विकास जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना हो और आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता नहीं करे| यह वर्तमान और भविष्य के बीच  संतुलन बनाए रखने पर जोर देता है| जीवन की गुणवता और वैश्विक शान्ति के लिए संसाधनों का संतुलित उपयोग आवश्यक है| सतत अस्तित्व , सतत विकास का महत्वपूर्ण भाग है|


मुख्य बिंदु


  i.   पर्यावरणक को सुरक्षित रखते हुए विकास

          ii.  भविष्य की आवश्यकताओं का संरक्षण



(iii) रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मलेन (1992) और एजेंडा 21


1992 में रियो डी जेनेरो ,ब्राजील में विश्व नेताओं ने पर्यावरण संरक्षण और विकास पर चर्चा की| यहाँ एजेंडा 21 अपनाया गया , जिसका उद्देश्य 21 वीं सदी में सतत विकास को बढ़ावा देना था| इसका लक्ष्य पर्यावरणीय क्षति, गरीबी और बीमारियों से निपटना था| प्रत्येक स्थानीय सरकार को अपना स्वंय का स्थानीय एजेंडा 21 बनाने का सुझाव दिया गया|


मुख्य बिंदु

       

          i.  वैश्विक स्तर पर पर्यावरण की चिंता

          ii. भविष्य के लिए एजेंडा 21


संसाधन नियोजन


 संसाधनों का वितरण  असमान है इसलिए संसाधनों को नियोजन आवश्यक है | कुछ क्षेत्र खनिजों से, कुछ जल से समृद्ध हैं जबकि कुछ क्षेत्रों में इसकी कमी है| संसाधन नियोजन में सर्वेक्षण, मानचित्रण , तकनीक का उपयोग और राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ तालमेल सम्मिलित होता है|


(i)भारत में संसाधन नियोजन


भारत में संसाधनों का वितरण बहुत ही असमान है , इसलिए संसाधन नियोजन एक जटिल और आवश्यक प्रक्रिया है| संसाधन नियोजन के तीन प्रमुख चरण हैं


       i.  संसाधनों की पहचान और सूचीकरणइसके लिए सर्वेक्षण, मान चित्रण तथा गुणात्मक और मात्रात्मक आंकलन किया जाता है|


       ii.  उपयुक्त तकनीक , कौशल और संस्थागत व्यवस्था से युक्त योजना विकसित करना


        iii. संसाधन विकास योजनाओं का राष्ट्रीय विकास योजनाओ से समन्वय करना|


स्वतंत्रता के बाद प्रथम पंचवर्षीय योजना  से ही भारत ने संसाधन नियोजन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयास शुरू किये गए|


किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों के साथ साथ तकनीक , संस्थाएं और मानव संसाधन का होना जरूरी है| भारत में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ संसाधन पर्याप्त है फिर भी आर्थिक रूप से पिछड़े हैं जबकि कुछ क्षेत्र ससाधन कम होने के बावजूद आर्थिक रूप से समृद्ध हैं|उपनिवेशवाद के इतिहास से पता चलता है कि प्राकृतिक संसाधन ही विदेशी आक्रमणकारियों के आकर्षण का मुख्य कारण थे| उन्नत तकनीक और संस्थागत व्यवस्था के कारणउन्होंने इन संसाधनों का दोहन किया|


मुख्य बिंदु

                     

         i.संसाधनों  के नियोजन के लिए पहचान, योजना और राष्ट्रीय समन्वय जरुरी है|

        ii.   संसाधन के साथ तकनीक और संस्थाओं को होना जरूरी है|

        iii.   उपनिवेशवाद में संसाधनों का दोहन तकनीकी श्रेष्ठता के कारण से हुआ|


(ii) संसाधनों का संरक्षण


संसाधन किसी भी विकासात्मक गतिविधि के लिए जरूरी होते हैं लेकिन उनका अनियंत्रित और अत्यधिक उपयोग सामाजिक,आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न करता है| इन समस्याओं से बचें के लिए संसाधनों का संरक्षण अलग अलग स्तरों पर होना चाहिए|


कई विचारकों और नेताओं ने भी संसाधन संरक्षण पर बल दिया| महात्मा गाँधी ने कहा किप्रकृति में सभी की जरूरतों के लिए पर्याप्त है पर किसी के लालच के लिए नहीं”|

संसाधनों का संतुलित उपयोग, सामान वितरण और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना इसका उद्देश्य है|


मुख्य बिंदु


         i. संसाधनों का अति उपयोग सामाजिक,आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याओं का कारण है|

        ii.  संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं |

 

भूमि एक संसाधन के  रूप में


भूमि एक अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन है| सभी आर्थिक गतिविधियाँ भूमि पर ही होती हैं| भारत में 43% मैदान, 30% पर्वत और 27% पठार हैं|मैदान कृषि के लिए, पर्वत नदियों और पर्यटन के लिए तथा पठार खनिजो और वनों के लिए महत्वपूर्ण हैं| भूमि सीमित है इसलिए इसका सावधानियो से उपयोग करना आवश्यक है|


(i)भू उपयोग


भूमि संसाधन का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है| किसी क्षेत्र में भूमि का उपयोग वहाँ की भौतिक परिस्थितियों ,जनसंख्या, परम्पराओं और आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर करता है| देश में भूमि का वर्गीकरण इस आधार पर किया गया है कि उसका उपयोग किस कार्य के लिए हो रहा है | इस वर्गीकरण से समझने में सहायता मिलती  है कि कितनी भूमि कृषि,वन,चरागाह, बंजर ,परती या गैर कृषि कार्यों में लगी हुई है|


 i. वन


भूमि का एक भाग वनों के अंतर्गत आता है| वन पर्यावरण संतुलन बनाए रखने , वर्षा लाने, वन्य जीवों के संरक्षण और लोगो की आजीविका के लयी महत्वपूर्ण हैं| वन भूमि का संरक्षण आवश्यक है क्यों कि यह पारिस्थिकी तंत्र का आधार है|


ii. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि


यह वह भूमि है जिस पर खेती नही की सकती है| इस दो भागों में बांटा जाता है – (i) बंजर और कृषि अयोग्य भूमि (ii) गैर कृषि कार्यों में लगी भूमि जैसे इमारतें, सड़कें और उद्योग आदि|यह भूमि मानव बस्तियों और विकास कार्यों के लिए उपयोगी होती है लेकिन यह भूमि कृषि के लिए उपयोग नहीं होता है|


iii. परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि


इस श्रेणी में स्थानी चरागाह , गोचर, भूमि , वृक्षों और उपवनों के अंतर्गत भूमि तथा कृषि योग्य बंजर भूमि आती है , जहाँ पाँच वर्ष या उससे अधिक समय से खेती नहीं हुई हो|यह भूमि उचित प्रबंधन से उपयोगी बनाई जा सकती है|


परती भूमि


यह वह भूमि  है जिस पर अस्थायी रूप से खेती नहीं की जाती है| वर्तमान परती भूमि वह है जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय  से खेती नही हुई हो| पुरानी परती भूमि वह है जहाँ 1 से 5 वर्ष तक खेती नही की गई हो| यह भूमि भविष्य में खेती के लिए उपयोगी हो सकती है|


शुद्ध (निवल )बोया गया क्षेत्र


जिस भूमि पर फसलें बोई और काटी जाती हैं, उसे शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहते हैं| यदि किसी भूमि पर एक वर्ष में एक से अधिक बार फसलें बोई जाए तो उसे सकल फसल क्षेत्र में जोड़ा जाता है| यह कृषि उत्पादन का महत्वपूर्ण संकेतक है|


भारत में भूमि उपयोग प्रारूप


भारत में भूमि का उपयोग भौतिक कारकों जैसे- स्थलाकृति ,जलवायु और मृदा प्रकार और मानवीय कारक जैसे जनसंख्या घनत्व , तकनीकी क्षमता, संस्कृति और परम्पराओं से निर्धारित होता है|


भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख  वर्ग किमी है,लेकिन भूमि उपयोग के आंकड़े लगभग 93% क्षेत्र के लिए ही उपलब्ध है| उत्तरी पूर्वी राज्य और जम्मू कश्मीर के वे भाग जो पाकिस्तान और चीन के कब्जे में हैं उनका सर्वेक्षण नहीं हो पाया है|


स्थायी चरागाह क्षेत्र में कमी आयी है लेकिन पशुधन की संख्या बहुत अधिक है|


वर्तमान परती के अतिरिक्त अन्य परती भूमि प्राय: कम गुणवत्ता की होती है या उसकी खेती की लागत बहुत अधिक होती है इसलिए उसे 2 – 3 वर्षों में एक दो बार ही जोता जाता है|इन्हें शुद्ध बोए क्षेत्र में जोड़ने पर भारत का NSA लगभग 54% रिपोर्टिंग क्षेत्र तक पहुँच जाता है|


राज्यों में शुद्ध बोए क्षेत्र का प्रतिरूप भी अलग अलग है जैसे पंजाब और हरियाण में 80% से अधिक, जब कि अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम , मणिपुर और अंडमान निकोबार में 10% से कम है|


भूमि निम्नीकरण और संरक्षण के उपाय


भूमि हमारी मूलभूत आवश्यकताओंभोजन,वस्त्र और आवास का लगभग 95% आधार है| यह हमें हमारे पूर्वजों से मिली है और इसे हमें आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित सौंपना है|


मानव गतिविधियों ने केवल भूमि का क्षरण किया है बल्कि प्राकृतिक शक्तियों द्वारा होने वाले नुकसान की गति को भी बढ़ा दिया है|


वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, खनन जैसी गतिविधियाँ भूमि क्षरण के प्रमुख कारण हैं| खनन कार्य के बाद खदानों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है जो मलबे के ढेर बन जाते हैं|


झारखंड, छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश और ओडिशा में खनन के कारण वनों की कटाई ने भूमि क्षरण को और ज्यादा गंभीर बना दिया है|


गुजरात,राजस्थान, महाराष्ट्र में अत्यधिक चराई इसका मुख्य कारण है| पंजाब,हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अत्यधिक सिंचाई से भूमि खराब होती है|


इन समस्याओं के संसाधन के लिए कई उपाय अपनाए जा सकते हैं जैसे:

    i.    i. वनीकरण करना

 ii.      ii.चराई का उचित प्रबंधन करना

iii.      iii.शुष्क क्षेत्रों में पौधों की पट्टियाँ (शेल्टर बेल्ट )लगाना

iv.      iv.कांटेदार झाड़ियों से रेत के टीलों को स्थिर करना

 v.      v.खनन गतिविधियों पर नियंत्रण

vi.      vi.औद्योगिक अपशिष्टों को उपचार के बाद उचित निपटान


मृदा संसाधन


मृदा या मिटटी सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है|पेड़-पौधों की वृद्धि और विभिन्न जीवों का जीवन मिटटी पर ही  निर्भर करता है|मृदा एक जीवित तंत्र है जिसे कुछ सेंटीमीटर बनने में भी लाखों वर्ष लगते हैं| मिट्टी के निर्माण में स्थलरूप, मूल शैल,जलवायु,वनस्पति , जीव जंतू और समय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| तापमान परिवर्तन,बहता पानी , हवा, हिमनद और अपघटक जीवों की क्रियाएँ मिटटी के निर्माण में सहायक होती हैं|मिटटी में कार्बनिक (ह्यूमस) और अकार्बिक पदार्थ पायें जाते हैं|

भारत में मृदा के प्रकारों का वितरण कक्षा 10

मृदा का वर्गीकरण


भारत में विविध स्थलरूप , जलवायु और वनस्पति के कारण अलग अलग प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं| मिट्टियों का वर्गीकरण रन, बनावट, मोटाई , आयु और रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर किया जाता है | मृदा या मिटटी के प्रकार निम्न हैं :


(i) जलोढ़ मिट्टी


जलोढ़ मिट्टी भारत में सर्वाधिक पाई जाने वाली मृदा हैं| सम्पूर्ण उत्तरी मैदान इसी मिटटी से बना है , जो सिन्धु नदी , गंगा नदी और ब्रह्मपुत्र नदी जैसी हिमालयी नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है| यह मिटटी राजस्थान और गुजरात तक एक संकरे गलियारे में और पूर्वी तटीय मैदानों के डेल्टा के क्षेत्र जैसे महानदी, गोदावरी नदी, कृष्णा नदी और कावेरी नदी में पाई जाती है|


इस मिटटी में रेत, गाद और चिकनी मिटटी अलग अलग अनुपात में होते हैं| नदी घाटियों के ऊपरी भाग पर कण अपेक्षाकृत मोटे होते हैं जैसे दुआर ,चोस और तराई क्षेत्रों में|


आयु के आधार पर इसे दो प्रकारों में विभिजित कर सकते हैं:


(i) पुरानी जलोढ़(बांगर) – कंकर,नोड्यूल अधिक, अपेक्षाकृत कम उप्जाऊ|

(ii) नयी जलोढ़ (खादर)-  महीन कण, अधिक उप्जाऊ, हर वर्ष नई परत |

उर्वरता और फसलें


जलोढ़ मिटटी में पोटाश,फॉस्फोरिक अम्ल और चूना पत्थर पर्याप्प्त मात्रा में  होता है| यह गन्ना , धान , गेहूं , डालें जैसी फसलों के लिए आदर्श हैं| शुष्क क्षेत्रो में यह क्षारीय हो सकती है किन्तु उचित सिंचाई व् उपचार से अत्यंत उत्पादक बनती है|


(ii)काली मिट्टी


ज्वालामुखीय चट्टानों से बनी काली मिट्टी को रेगर मिट्टी या कपास मिट्टी भी कहते हैं| यह भारत की एक बहुत ही महत्वपूर्ण मिट्टी है|


यह काले रंग की होती है| इसमें नमी को बनाए रखें की क्षमता होती है| यह बहुत ही बारीक कणों से बनी होती है|गीली होने पर यह चिपचिपी हो जाता है पर सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती है जिससे हवा का संचार अच्छे तरीके से होता है|


इस मिट्टी मुख्य रूप से लावा प्रवाह से बनती है|यह मिट्टी भारत के दक्षिण के पठार क्षेत्र में पाई जाती है जिनमे महाराष्ट्र ,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,सौराष्ट्र , मालवा आदि शामिल हैं| यह गोदावरी नदी घाटी और कृष्णा नदी घटी तक फैली हुई है|


इस मिट्टी में केल्शिय कार्बोनेट,मैग्नेशियम , पोटाश और चूना पत्थर अधिक मात्रा में पायें जाते  हैं,किन्तु इसमें फोस्फोरस की मात्रा कम होती है|


यह मिट्टी कपास की खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है |


(iii)लाल और पीली मिट्टी


ये मिट्टी उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वर्षा बहुत कम होती है| या मिट्टी मुख्य रूप से क्रिस्टलीय आग्नेय चट्टानों पर विकसित होती है| , विशेषकर दक्षिण पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में| इसके अलावा यह मिट्टी उड़ीसा, छत्तीसगढ़ , मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी भागों तथा पश्चिमी घाट के पहाडी पद में पाई जाती है|


इस मिट्टी का लाल रंग क्रिस्टलीय और रूपांतरित चट्टानों  में मौजूद लोहे के प्रसार के कारण होता है | जब इसमें नमी या जलयोजन होता है तो इसका रंग पीला दिखाई देता है इसलिए इसे लाल और पीली मिट्टी कहते हैं|


(iv) लेटराइट मिट्टी


इसका नाम लेटिन शब्दlater’ से लिया गया है, जिसका अर्थईंट होता है| यह मिट्टी उष्ण कटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा और शुष्क ऋतु बारी बारी से आती है |


यह मिट्टी भारी वर्षा के कारण होने वाली तीव्र निक्षालन प्रक्रिया का परिणाम होती है| लेटराइट मिटटी अम्लीय (pH 6.0 से कम ) होती है और इसमें पौधों के पोषक तत्वों की कमी होती है|


यह मिट्टी मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों, पश्चिमी घाट क्षेत्र, ओड़िसा, पश्चिम बंगाल के कुछ भागों और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में पाई जाती है|


जहाँ इस मिट्टी पर घने पर्णपाती और सदाबहार वन पाए जाते हैं वहाँ इसमें ह्यूमस भरपूर मात्रा में पाया जाता है|


मृदा संक्षरण की उचित तकनीक अपनाकर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू के पहाड़ी क्षेत्रों में चाय और कॉफी की खेती की जाती है|


तमिलनाडू,आंध्र प्रदेश और केरल में इस मिट्टी में काजू की फसलें उगाई जाती है|


(v) मरुस्थली मृदा(शुष्क मिट्टी)


यह मिट्टी लाल से भूरे रंग की होती है| यह मुख्य रूप से राजस्थान के शुष्क एंव रेगिस्तानी क्षेत्रों में पाई जाती है|यह मिट्टी रेतीली और लवणीय प्रकृति की होती है|कई स्थानों पर इसमें नामक की मात्रा अधिक होती है इसलिए वहाँ जल को वाषिप्त करके नमक प्राप्त किया जाता है|


कम वर्षा, उच्च तापमान और तेज वाश्पीकर्ण के कारण इसमें नमी और ह्यूमस की कमी होती है|मिट्टी की निचली परतों में केल्सियम की मात्र बढ़ जाने से कंकर की परते बन जाती हैं जो पानी के रिसाव को रोकती है|यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है लेकिन सिंचाई और सही जल प्रबंधन से इसे कृषि योग्य बनाय जा सकता है|


(vi) वन मिट्टी


यह मिट्टी उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ पर्याप्त वर्षा और घने वन पाए जाते है , जैसे पहाडी और पर्वतीय क्षेत्र | इन मिट्टियों की बनवट पर्वतीय पर्यावरण  के अनुसार बदलती रहती है| घाटियों के किनारों पर यह मिट्टी दोमट और सिल्टदार होती है|


ऊंचे ढाल वाले क्षेत्रों में यह अधिक मोटे कणों वाली होती है| हिमालय क्षेत्र में इसका अपरदन अधिक होता है और यह अम्लीय  होती है और कम ह्यूमस वाली होती है|नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों में यह उपजाऊ होती है|


 

मृदा अपरदन


वह प्रक्रिया जिसमे मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ  परत प्राकृतिक या मानव जनित कारणों से हट जाती है,इसे मृदा अपरदन कहते हैं|


मृदा अपरदन के कारण


         i.   वनों की कटाई , अत्यधिक पशु चराई

         ii.  खनन, निर्माण कार्य

         iii.  जल ,वायु और हिमनद आदि

         iv.  बहता हुआ जल

         v.   तेज वायु मिट्टी की ऊपरी परत को हटा देती है|


मृदा संरक्षण के उपाय 


मृदा संरक्षण के लिए निम्न उपाय किये जा सकते हैं:


 i.समोच्च जुताई में ढाल के अनुसार जुताई की जाति है जिसमे पानी का बहाव धीमा हो जता है और मिट्टी का कटाव कम होता है|


ii.सीढीनुमा खेती पहाडी क्षेत्रो में की जाती है जो मिट्टी को बहने से बचाती है|


iii.स्ट्रिप क्रोपिंग में खेतों को अलग अलग पट्टियों में बांटकर बीच में घास उगाई जाती जिससे हवा की  गति कम हो जाती है ,जो अपरदन को रोकती है|


iv. शेल्टर बेल्ट पेडों की कतारें होती हैं जो रेगिस्तानी क्षेत्रों में रेत के टीलों को स्थिर करने में मदद करती हैं|


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